क्या आप जानते है उज्जैन में आये साधुओं के हठयोग क्यों करते है वो ऐसा ?

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साधु-संत हमेशा से अपने रूप, स्वाभाव और अपने गुणों के कारण  पूरी दुनिया मे प्रसिद्ध हैं| इन साधु-संतों की एक अलग ही दुनिया होती हैं| बाहर से सामान्य दिखने वाले इन साधुओं के कई प्रकार के रूप और नाम होते है| आज हम आपको उज्जैन मे चल रहे सिंहस्थ मे उपस्थित कुछ साधु-संत के बारे मे बताएँगे जो अपने हठयोग के कारण बहुत चर्चित हैं और आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं| आज आपको साधुओं से जुड़ी कुछ ऐसी ही बातें बताने वाले हैं,  जिनके बारे मे बहुत कम लोग जानते हैं|

 

१) दण्डी:

         इस प्रकार के साधु हमेशा अपने साथ दण्ड व कमंडल रखते हैं| दण्ड बांस के एक टुकड़े से बना होता हैं, जिसे गेरुआ रंग के कपड़े से ढका जाता है| ऐसे साधु कभी भी किसी धातु की वस्तु को नहीं छूते हैं और प्रत्येक दिन भिक्षा के लिए एक बार ही जाते हैं|

 

२) अलेखिया:

           इस शब्द की उत्पत्ति अलेख से हुआ हैं, जिसका प्रयोग भिक्षा मांगते वक्त सन्यासी उपयोग करते हैं| ये साधु कुछ विशेष प्रकार के आभूषण को धारण करते हैं जैसे तोरा, छल्ला इत्यादि जिसे चांदी, पीतल या तांबे से बनाया जाता है| ये साधु अपनी कमर मे छोटी-छोटी घंटियां को बांधते हैं क्योंकि लोग उनकी तरफ ध्यान दें|

 

३) थारेश्वरी:

          इस प्रकार के संन्यासी दिन रात खड़े रहते हैं| इन साधुओं को हठयोगी कहा जाता हैं| ये हमेशा ही खड़े-खड़े भोजन करते हैं और सोते हैं|

 

४) ऊर्ध्वबाहु :

          ये संन्यासी अपने इष्ट देव को प्रसन्न करने के लिए हमेशा एक या दोनों हाथ ऊपर उठकर रखते हैं|

 

५) ऊर्ध्वमुखी:

             ऐसे संन्यासी अपने पैरों को किसी पेड़ की शाखा से बांधकर अपना पैर ऊपर और शीश निचे की ओर करके लटकते रहते हैं|

 

६) नखी:

          नखी उन साधुओं या संन्यासी को कहा जाता है, जो अपने नाखून सालों तक काटते ही नहीं हैं| इनके नाखून सामान्य से कई गुना बड़ा होता हैं|

 

७) पंचधुनी:

          ऐसे साधु टप तप करते वक्त अपने चारों तरफ आग जलाते हैं| तत्पश्चयात मिटटी के बर्तन मे अंगारे को रखकर अपने शीश पे रखते हैं ओर फिर साधना करते हैं|

 

८) मौनव्रती :

           मौनव्रती का मतलब ऐसे साधु जिन्होंने मौन रहने की शपथ लिए हों, उन्हें ही हम मौनव्रती कहते हैं| इन्हें अगर कुछ बोलना होता हैं तो ये हमेशा कागज पे लिखके उसे बताते हैं|

 

९) जलसाजीवी :

            जलसाजीवी का मतलब  नदी या तालाब के पानी मे रहना | कुछ साधु नदी हो या तालाब उसके जल मे सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक कमर के इतना पानी मे खड़े रहकर अपनी तपस्या करते हैं|

 

१०) जलधारा तपसी:

ये साधु किसी गड्ढे मे बैठकर अपने शीश पे पानी का घड़ा रखते हैं जिस मे एक छेद होता हैं ओर इस घड़े का पानी धीरे-धीरे छिद्रों से इन पे गिरता रहता हैं|

 

११) फलहारी

           हम फलहारी का प्रयोग सिर्फ ओर सिर्फ उपवास के दौरान करते हैं| ये साधु भोजन को कभी भी ग्रहण नहीं करते हैं| भोजन पे इनका नियंत्रण करना ही इनकी साधना का प्रमुख उद्देश्य होता हैं| ये सिर्फ ओर सिर्फ फल को ही ग्रहण करते हैं|

 

१२) दूधारी :

          ऐसे साधु कभी भी न तो अन्न को ग्रहण करते हैं और  न ही कभी फल को ग्रहण करते हैं| ये केवल दूध को पीकर ही अपना जीवन जीते हैं| ये किसी प्रकार की चीजें जो खाने के लिए होती हैं उन्हें ग्रहण नहीं करते हैं| दूध पीकर रहना इनकी साधना का उद्देश्य रहता हैं|

 

१३) अलूना :

           ऐसे साधु भोजन तो ग्रहण करते हैं लेकिन उनके भोजन में नमक की एक मात्रा भी मौजूद नहीं रहती हैं| भारत के कुछ हिस्सों मे नमक को लूँ कहा जाता हैं| इसलिए अलूना का अर्थ हों बिना नमक का |

 

१४) सुखर:

         इस प्रकार के साधु अपना जीवन भिक्षा मांगकर अपना जीवन-यापन करते हैं| और ये हमेशा भिक्षा मांगने के लिए नारियल से बने खप्पर का प्रयोग करते हैं| ये जब भी भिक्षा मांगने निकलते हैं तो उस समय सुगन्धित वस्तुएं जलाते हैं|

 

१५) त्यागी :

           कुछ साधु/संन्यासी भिक्षा कभी भी नहीं मांगते हैं उन्हें जो भी मिल जाता  है, बिना मांगे वे उन्हीं को ग्रहण कर लेते हैं और अपना जीवन गुजारते हैं|

 

१६) अवधूतनी:

             ये महिला संन्यासिनी होती हैं, जो माला को धारण करती हैं और त्रिपुंड बनती हैं| ये अपना जीवन भिक्षा मांगकर अपना जीवन जीती हैं|

 

१७) टिकरनाथ:

              ये साधु भैरव जी की पूजा करते हैं| टिकरा का मतलब मिटटी से बने बर्तन होते हैं| जिस मे साधु भोजन ग्रहण करते हैं| इसी कारण वश इन्हें टिकरनाथ के नाम से सम्बोधित किया जाता है|

 

१८) भोपा:

            कुछ साधु भिक्षा के दौरान अपनी कमर  या पैर मे घंटियां बांधते हैं, और भगवान भैरव की स्तुति करते- करते नाचते हैं| इस प्रकार के साधु भैरव की खुब भक्ति करते हैं|