4 जुलाई देवशयनी एकादशी व्रत, इस प्रकार करें श्री हरी की पूजा

देवशयनी एकादशी आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहा जाता है। शास्त्र अनुसार भगवान श्री हरी चार महीने तक योग निद्रा में जाते हैं। चातुर्मास हिन्दू कैलेंडर के अनुसार इसी दिन से शुरू होता है जो चार महीने तक होता है। इन चार महीनों में किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य नहीं किये जाते हैं। इस समय सिर्फ भगवान की भक्ति करने की सलाह दी जाती है। इस बार देवशयनी एकादशी 4 जुलाई मंगलवार के दिन है। आज हम जानेंगे इस पूजा को करने की विधि और कथा।

व्रत विधि और पूजन:

एकादशी के दिन प्रातः काल उठकर घर की साफ-सफाई करें और नित्य कर्म से निवृत्त हो जाएं। उसके बाद स्नान कर पवित्र नदी गंगाजल से घर में छिड़काव करें। घर के पूजा स्थल या घर के किसी भी पवित्र स्थल पे श्री हरी की सोने, चांदी, तांबे अथवा पीतल की मूर्ति स्थापित करें। उसके बाद षोड्शोपचार सहित उनकी पूजा करें। उन्हें पिले वस्त्र से विभूषित करें। तत्पश्च्यात व्रत कथा सुने। उसके बाद आरती करें और प्रसाद का वितरण करें। ब्राह्मण को भोजन कराएं। पूजा की समस्त विधि के बाद अंत में सफेद चादर से ढंके गद्दे व तकिये वाले पलंग पे श्री हरी को शयन कराएं। तथा स्वयं जमीन पर सोएं।

 

एकादशी व्रत कथा:

एक बार नारद मुनि ब्रह्म देव से इस एकादशी के महत्त्व जानना चाहें। तब ब्रह्म देव ने उन्हें बताया की सतयुग के समय मांधाता नामक एक चक्रवर्ती राजा थे, जिनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। एक बार उनके राज्य में बहुत भयंकर अकाल पड़ा। इस अकाल से चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। तब सारी प्रजा ने राजा के समक्ष जा कर उनके सामने सारी व्यथा सुनाई। तब उन्होंने इस समस्या के निदान के लिए सेना को लेकर जंगल की और प्रस्थान किया। वहां पहुंचकर वे ब्रह्म देव के पुत्र अंगिरा ऋषि से मिलने उनके आश्रम पहुंचें। उन्होंने अपनी राज्य और प्रजा की व्यथा सुनाई। तब ऋषि ने कहा की यह सभी युगों में श्रेष्ट युग है। इस युग में एक छोटे से गलत काम के लिए बड़े भयंकर दंड का सामना करना पड़ता है। इस इस युग में ब्राह्मण के अतिरिक्त किसी भी अन्य जाति को तप करने का अधिकार नहीं है और आपके राज्य में एक अन्य जाति का मनुष्य तप कर रहा है जिसके कारण राज्य में वर्षा नहीं हो रही है। जब तक उसका अंत नहीं होगा तब तक वर्षा नहीं होगी। लेकिन राजा किसी निरपराध तपस्वी को मरने के लिए तैयार नहीं थे। तब महर्षि ने आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी व्रत करने को कहा। तब राजा के साथ सभी प्रजा ने देवशयनी एकादशी का व्रत विधिपूर्वक किया। व्रत प्रभाव के कारण राज्य में मूसलाधार वर्षा हुई और पुनः पूरा राज्य धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया।

 

4 महीने पाताल में रहेंगे श्री हरी:

श्री हरी के पाताल में रहने के पीछे एक कहानी है। शास्त्र के अनुसार श्री हरी ने वामन अवतार लेकर दैत्यराज बलि के समक्ष तीन पग भूमि का दान लेने गए थे। जब बलि ने उन्हें 3 पग जमीन देने के लिए वचन दिया तब श्री हरी अपने रूप में आकर प्रथम पग सम्पूर्ण पृथ्वी, द्वितीय पग सम्पूर्ण स्वर्ग लोक ले लिए। उसके बाद तीसरे पग के लिए बलि ने अपने आप को समर्पित कर दिया। इससे प्रसन्न होकर श्री हरी ने बलि को पाताल लोक का राजा घोषित किया और उन्हें वर प्रदान किया।

बलि ने वर मांगते हुए कहा की प्रभु आप मेरे महल में निवास करेंगे। तब उन्होंने वरदान स्वरुप बलि के महल में चार मास रहने का वरदान दिया। इसी कारण श्री हरी देवशयनी एकादशी से देवप्रबोधिनी एकादशी तक पाताल में बलि के महल में निवास करते हैं।

ये समस्त जानकारियां शास्त्र के अनुसार है|

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